alok kumar singh ballia

Saturday, 11 June 2011

ना इतराना आता है,ना दिखाना आता है....
तेरे दर पर तो बस एक दीवाना आता है......
ना तेरा प्यार चाहिए..ना इकरार चाहिए...
क्योंकि...
दिल तोड़कर तुझे बहुत "समझाना" आता है..

तेरा दर को भी अब तो भगाना आता है...
जब-जब उसे दीखता कोई दीवाना आता है.,
ये गलती भी नही उसकी..ना कोई गिला है..,
दीवानों की इज्जत को उसे बचाना आता है..
मिटाते हुए निशान एहतियात जरा तुम रखना..
उसमे तेरे नाम का इक फ़साना आता है..

और बस मेरे धब्बों के परत को ही मिटाना.....क्योंकि
तेरे दर की आवाज़ थी.तू क्या है..इक दीवाना..?
इस दर पर तो "जमाना"दीवाना आता है...
उनके धब्बे जो फिर उभरे तेरे दीवारों पे...
मुझे यकीं हो चलेगा...की तुझे बस
कर दे जख्मी ऐसा "निशाना" आता है...
 
दोस्तों जाते-जाते घर को अपने मेरा एक कलाम लेते जाना
अपने-अपने माता-पिता को अम्बर का"सलाम"लेते जाना..,
 
और मोहब्बत भी अब थोड़ी अजीब लगती है..
पैसे वालों के सामने गरीब लगती है....
"अम्बर"
 
उनके हर दीदार की खातिर हमने बहुत कुछ खोया.....है
उनकी हंसी की खातिर हंसा और
उनकी हंसी के खातिर ही रोया..है
 
शहर का अकेलापन समझ आता है.........................तनहा रखा मेरा गाँव मुझे
सबको मुझे डुबोने की तमन्ना है,सहारा दिया तो बस मेरे जिंदगी की नाव मुझे
तेरे दीदार की एक ख्वाइश शाएद तुझे मरने नहीं देती........................"अम्बर"
सब फीका लगा है जिंदगी में .......अच्छी लगी तो बस तेरे जुल्फ की छांव मुझे..
 

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